मुझ से पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब नः माँग
मैंने समझा था केः तू है तो दरख़्शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दह्र का झगडा क्या है?
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है?
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
यूँ नः था मैं न फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़्वाब में बुनवाये हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कुचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए,ख़ून में नहलाए हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है इधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकस है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे?
और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब नः माँग
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Friday, 6 July 2007
Monday, 2 July 2007
आज की रात
आज की रात साज़-ए-दर्द नः छेड़
दुख से भरपूर दिन तमाम हुए
और कल की ख़बर किसे मालूम
दोश-ओ-फ़र्दा की मिट चुकी हैं हुदूद
हो नः हो अब स़हर किसे मालूम
ज़िंदगी हेच !लेकिन आज की रात
ए़ज़दीयत है मुमकिन आज की रात
आज की रात साज़-ए-दर्द नः छेड़
अब न दौहरा फ़साना-हाए-अलम
अपनी क़िस्मत पे सोगवार नःहो
फ़िक्र-ए-फ़र्दा उतार दे दिल से
उम्र-ए-रफ़्ता पे अश्कबार नःहो
अहद-ए-ग़म की हिकायतें मत पूछ
हो चुकी सब शिकायतें मत पूछ
आज की रात साज़-ए-दर्द नः छेड़ !
दुख से भरपूर दिन तमाम हुए
और कल की ख़बर किसे मालूम
दोश-ओ-फ़र्दा की मिट चुकी हैं हुदूद
हो नः हो अब स़हर किसे मालूम
ज़िंदगी हेच !लेकिन आज की रात
ए़ज़दीयत है मुमकिन आज की रात
आज की रात साज़-ए-दर्द नः छेड़
अब न दौहरा फ़साना-हाए-अलम
अपनी क़िस्मत पे सोगवार नःहो
फ़िक्र-ए-फ़र्दा उतार दे दिल से
उम्र-ए-रफ़्ता पे अश्कबार नःहो
अहद-ए-ग़म की हिकायतें मत पूछ
हो चुकी सब शिकायतें मत पूछ
आज की रात साज़-ए-दर्द नः छेड़ !
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